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वो चांदनी रात -9



“वर्षा मेरा हाथ पकड़ो और भागो यहाँ से” ----- मदन ने वर्षा से कहा और उसे खींच कर किशोर और रूपा के पीछे-पीछे भगा ले चला..
“ओह.. हो… ये कौन बदतमीज़ है”

“ये मैं हूँ”

“तू… रुक तुझे अभी मजा चखाता हूँ….”

“कब से आवाज लगा रही हूँ, उठ ही नहीं रहे थे, इसलिए मैंने पानी दाल दिया”

“भागती कहा है, रुक….. इस खेत के कोने-कोने से वाकिफ हूँ मैं देखता हूँ कहा चुपोगी जाकर”


“अच्हा…देखते हैं”

वो जाकर घनी फसलों में चुप जाती है

मदन चुपचाप दबे पाँव पीछे से आकर उसे दबोच लेता है

“अब पता चलेगा तुझे…. आज तुझे तालाब में ना डुबोया तो मेरा नाम भी मदन नहीं”


“अरे, साधना !! बेटी तुम कहा हो ?”


“मैं यहाँ हूँ पिता जी, देखो ना भैया मुझे तालाब में डुबोने जा रहे हैं”


“तुम दोनों हर दम बस लड़ाई झगडा किया करो, यहाँ खेत में काम कौन करेगा ?”






“पिता जी आज फिर इसने मेरे ऊपर पानी दाल दिया, ये कब सुधरेगी” --- मदन ने साधना का कान पकड़ कर उसे फसलों से बाहर लेट हूवे कहा .


“छोड़ दो उसे मदन और चलो आज बहुत काम करना है, धुप तेज हो जायेगी तो काम करना मुस्किल होगा”


“जी पिता जी पर इशे समझाओ वर्ना मैं इशे जान से मार दूंगा” --- मदन ने थोडा गुस्से में कहा


“मेरे प्यारे भैया ऐसा मत कहो वर्ना तुम्हे राखी कौन बंधेगा ?”

“अच्हा ठीक है, मैं खुद मर जाता हूँ”

“नहीं भैया ऐसा क्यों कहते हो, मैं आगे से ऐसा नहीं करुँगी” --- साधना ने मदन के गले लग कर कहा


“अजीब प्यार है तुम दोनों का, सारा दिन लड़ते झगड़ते रहते हो पर एक दुसरे के बिना तुम्हारा मन भी नहीं लगता”


“पिता जी मैं इसे इतना प्यार करता हूँ तभी तो ये मुझे इतना परेशान करती है”


ये सब बीते कल की घटना है.

साधना कोई गीत गुण-गुनाती हुयी हंसती मुस्कुराती हुयी अपनी दीदी के साथ आगे बढ़ रही है, और ये सब सोच रही है.

“अरे क्या सोच रही है साधना”

“कुछ नहीं दीदी बस यु ही कल की बात याद आ गयी थी”

“तुने आज कोई शरारत की ना तो मदन बहुत मारेगा तुझे” --- सरिता ने कहा

साधना ने सरिता की बात सुन कर मूह लटका लीया.


चिडयों की आवाज चारो तरफ गूंज रही है. सूरज की पहली किरण खेतो पर पद रही है, ऐसा लग रहा है जैसे प्रकृति ने चारो तरफ सोना बिखेर दिया हो. साधना और सरिता बाते करते हूवे खेत की तरफ बढ़ रहे हैं. उनके पीछे पीछे उनके पिता जी, गुलाब चाँद भी आ रहे हैं



“ये चिडयों की आवाज सुबह सुबह कितनी प्यारी लगती है हैं ना दीदी”


“हाँ बहुत प्यारी लगती है, रोज यही बात कहती हो तुम, कुछ और नहीं है क्या कहने को सुबह सुबह”

“पर देखो ना ये चिडयों की आवाज ही है जिसके कारण हम रोज वक्त से उठ जाते हैं वर्ना हमें पता ही ना चले वक्त का” --- साधना ने कहा


“भगवान् को तुझे चिड़िया ही बना-ना चाहिए था, चिड़ियों को दाना डालती है, पानी देती है, हर रोज उनकी तारीफ़ करती है, पता नहीं क्या है इन चिड़ियों में, हम से ज्यादा तू इन चिड़ियों से प्यार करती है” ---- सरिता ने कहा


साधना, सरिता की बात सुन कर बहुत उदास हो जाती है

“अरे क्या हूवा ये चेहरा क्यों लटका लीया, मैंने प्रेम को तो कुछ नहीं कहा ?”




साधना की आँखों में आंसू उतर आते हैं.

“दीदी चिड़ियों को प्यार दे के मैं खुद को प्रेम के नज़दीक महसूस कर पाती हूँ, वर्ना अब बचा ही क्या है”



“हाँ हाँ जानती हूँ, यहाँ खेत में भी तुम प्रेम के लिए ही आती हो, आखरी बार यहीं देखा था ना तुमने उसे” --- सरिता ने कहा


“सब कुछ जान कर भी ऐसी बाते करती हो दीदी, मुझे दुःख दे कर तुम्हे क्या मिल जाता है”


सरिता साधना को रोक कर गले लगा लेती है और कहती है, “ अरे पगली, मैं क्या तेरी दुश्मन हूँ, जाने वाले लौट कर नहीं आते, कब तक प्रेम की यादों को अपने सर पर ढोती रहोगी, भूल जाओ उसे अब”

“दीदी कुछ भी कहो पर मुझे मेरे प्रेम की यादों से जुदा मत करो, मैं जी नहीं पाउंगी, यहाँ खेतो में भी मैं अक्सर इसलिए आती हूँ क्योंकि आखरी बार प्रेम को यहीं देखा था, लगता है अभी वो कहीं से आएगा और…..”


ये कह कर साधना फूट-फूट कर रोने लगती है

“बस-बस साधना चुप हो जाओ, मेरा मकसद तुम्हे दुःख देना नहीं है पगली, मैं तो बस ये कह रही थी की जींदगी किसी के लिए नहीं रूकती. कब तक प्रेम की यादों में डूबी रहोगी, कल को शादी होगी तो भी तो तुम्हे उसे भुलाना ही पड़ेगा” --- सरिता ने साधना को समझाते हूवे कहा


“मैं शादी नहीं करुँगी दीदी, मैं प्रेम के सीवा किसी से शादी नहीं कर सकती”


“कहा है प्रेम ?, कब आएगा प्रेम ?, पता नहीं वो जींदा है भी या नहीं, क्यों उसके लिए इतनी पागल बन रही हो, अब मैं ये पागल-पण और बर्दास्त नहीं कर सकती”


“फिर मुझे जहर दे दो दीदी, पर मैं ये पागल-पण नहीं छोड़ सकती. और हाँ प्रेम इस दुनिया मैं हो या ना हो पर वो मेरे दील में हमेशा जींदा रहेगा” --- साधना ने भावुक हो कर कहा


“तू बस मदन की बात सुनती है, हम तो तेरे कोई हैं ही नहीं, अब वो ही तुझे समझाएगा”

“वर्षा मेरा हाथ पकड़ो और भागो यहाँ से” ----- मदन ने वर्षा से कहा और उसे खींच कर किशोर और रूपा के पीछे-पीछे भगा ले चला..
“ओह.. हो… ये कौन बदतमीज़ है”

“ये मैं हूँ”

“तू… रुक तुझे अभी मजा चखाता हूँ….”

“कब से आवाज लगा रही हूँ, उठ ही नहीं रहे थे, इसलिए मैंने पानी दाल दिया”

“भागती कहा है, रुक….. इस खेत के कोने-कोने से वाकिफ हूँ मैं देखता हूँ कहा चुपोगी जाकर”


“अच्हा…देखते हैं”

वो जाकर घनी फसलों में चुप जाती है

मदन चुपचाप दबे पाँव पीछे से आकर उसे दबोच लेता है

“अब पता चलेगा तुझे…. आज तुझे तालाब में ना डुबोया तो मेरा नाम भी मदन नहीं”


“अरे, साधना !! बेटी तुम कहा हो ?”


“मैं यहाँ हूँ पिता जी, देखो ना भैया मुझे तालाब में डुबोने जा रहे हैं”


“तुम दोनों हर दम बस लड़ाई झगडा किया करो, यहाँ खेत में काम कौन करेगा ?”






“पिता जी आज फिर इसने मेरे ऊपर पानी दाल दिया, ये कब सुधरेगी” --- मदन ने साधना का कान पकड़ कर उसे फसलों से बाहर लेट हूवे कहा .


“छोड़ दो उसे मदन और चलो आज बहुत काम करना है, धुप तेज हो जायेगी तो काम करना मुस्किल होगा”


“जी पिता जी पर इशे समझाओ वर्ना मैं इशे जान से मार दूंगा” --- मदन ने थोडा गुस्से में कहा


“मेरे प्यारे भैया ऐसा मत कहो वर्ना तुम्हे राखी कौन बंधेगा ?”

“अच्हा ठीक है, मैं खुद मर जाता हूँ”

“नहीं भैया ऐसा क्यों कहते हो, मैं आगे से ऐसा नहीं करुँगी” --- साधना ने मदन के गले लग कर कहा


“अजीब प्यार है तुम दोनों का, सारा दिन लड़ते झगड़ते रहते हो पर एक दुसरे के बिना तुम्हारा मन भी नहीं लगता”


“पिता जी मैं इसे इतना प्यार करता हूँ तभी तो ये मुझे इतना परेशान करती है”


ये सब बीते कल की घटना है.

साधना कोई गीत गुण-गुनाती हुयी हंसती मुस्कुराती हुयी अपनी दीदी के साथ आगे बढ़ रही है, और ये सब सोच रही है.

“अरे क्या सोच रही है साधना”

“कुछ नहीं दीदी बस यु ही कल की बात याद आ गयी थी”

“तुने आज कोई शरारत की ना तो मदन बहुत मारेगा तुझे” --- सरिता ने कहा

साधना ने सरिता की बात सुन कर मूह लटका लीया.


चिडयों की आवाज चारो तरफ गूंज रही है. सूरज की पहली किरण खेतो पर पद रही है, ऐसा लग रहा है जैसे प्रकृति ने चारो तरफ सोना बिखेर दिया हो. साधना और सरिता बाते करते हूवे खेत की तरफ बढ़ रहे हैं. उनके पीछे पीछे उनके पिता जी, गुलाब चाँद भी आ रहे हैं



“ये चिडयों की आवाज सुबह सुबह कितनी प्यारी लगती है हैं ना दीदी”


“हाँ बहुत प्यारी लगती है, रोज यही बात कहती हो तुम, कुछ और नहीं है क्या कहने को सुबह सुबह”

“पर देखो ना ये चिडयों की आवाज ही है जिसके कारण हम रोज वक्त से उठ जाते हैं वर्ना हमें पता ही ना चले वक्त का” --- साधना ने कहा


“भगवान् को तुझे चिड़िया ही बना-ना चाहिए था, चिड़ियों को दाना डालती है, पानी देती है, हर रोज उनकी तारीफ़ करती है, पता नहीं क्या है इन चिड़ियों में, हम से ज्यादा तू इन चिड़ियों से प्यार करती है” ---- सरिता ने कहा


साधना, सरिता की बात सुन कर बहुत उदास हो जाती है

“अरे क्या हूवा ये चेहरा क्यों लटका लीया, मैंने प्रेम को तो कुछ नहीं कहा ?”




साधना की आँखों में आंसू उतर आते हैं.

“दीदी चिड़ियों को प्यार दे के मैं खुद को प्रेम के नज़दीक महसूस कर पाती हूँ, वर्ना अब बचा ही क्या है”



“हाँ हाँ जानती हूँ, यहाँ खेत में भी तुम प्रेम के लिए ही आती हो, आखरी बार यहीं देखा था ना तुमने उसे” --- सरिता ने कहा


“सब कुछ जान कर भी ऐसी बाते करती हो दीदी, मुझे दुःख दे कर तुम्हे क्या मिल जाता है”


सरिता साधना को रोक कर गले लगा लेती है और कहती है, “ अरे पगली, मैं क्या तेरी दुश्मन हूँ, जाने वाले लौट कर नहीं आते, कब तक प्रेम की यादों को अपने सर पर ढोती रहोगी, भूल जाओ उसे अब”

“दीदी कुछ भी कहो पर मुझे मेरे प्रेम की यादों से जुदा मत करो, मैं जी नहीं पाउंगी, यहाँ खेतो में भी मैं अक्सर इसलिए आती हूँ क्योंकि आखरी बार प्रेम को यहीं देखा था, लगता है अभी वो कहीं से आएगा और…..”


ये कह कर साधना फूट-फूट कर रोने लगती है

“बस-बस साधना चुप हो जाओ, मेरा मकसद तुम्हे दुःख देना नहीं है पगली, मैं तो बस ये कह रही थी की जींदगी किसी के लिए नहीं रूकती. कब तक प्रेम की यादों में डूबी रहोगी, कल को शादी होगी तो भी तो तुम्हे उसे भुलाना ही पड़ेगा” --- सरिता ने साधना को समझाते हूवे कहा


“मैं शादी नहीं करुँगी दीदी, मैं प्रेम के सीवा किसी से शादी नहीं कर सकती”


“कहा है प्रेम ?, कब आएगा प्रेम ?, पता नहीं वो जींदा है भी या नहीं, क्यों उसके लिए इतनी पागल बन रही हो, अब मैं ये पागल-पण और बर्दास्त नहीं कर सकती”


“फिर मुझे जहर दे दो दीदी, पर मैं ये पागल-पण नहीं छोड़ सकती. और हाँ प्रेम इस दुनिया मैं हो या ना हो पर वो मेरे दील में हमेशा जींदा रहेगा” --- साधना ने भावुक हो कर कहा


“तू बस मदन की बात सुनती है, हम तो तेरे कोई हैं ही नहीं, अब वो ही तुझे समझाएगा”


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